Tuesday, 3 November 2015

भारत की चीन को चुनौती, दक्षिण चीन सागर में भेजेंगे शिप

अमेरिका के बाद अब भारत ने चीन की तानाशाही को चुनौती दी है। भारत ने कहा है कि हम भी दक्षिण चीन सागर में अपने जहाज भेजेंगे। साथ ही भारत समुद्र के ऊपर उड़ान भरने के लिए भी आजाद है।

भारत का कहना है कि वह इलाका 'फ्रीडम ऑफ नेविगेशन' के दायरे में आता है। अगर इस इलाके पर विवाद है तो उसका हल इंटरनेशनल कानून के दायरे में किया जाए। अमेरिका ने पिछले हफ्ते दक्षिण चीन सागर में अपना जहाज भेजा था। चीन ने इस पर ऐतराज जताया था। उसने अमेरिकी जहाज का पीछा भी किया था।

ऐसा पहली बार है कि जब विवादित दक्षिण चीन सागर के मामले में भारत ने इतना सख्त रवैया अपनाया है। बता दें कि भारत का 55 फीसदी समुद्री कारोबार इसी रास्ते से होता है। 

भारतीय अफसरों ने बताया कि हाल ही में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की फिलीपींस के फॉरेन मिनिस्टर अल्बर्ट एफडे रोसारियो के साथ मीटिंग हुई थी। भारत ने फिलीपींस से वादा किया कि वह दक्षिण चीन सागर को पश्चिम फिलीपींस सागर के नाम से बुलाएगा।

क्यों है विवाद-

दक्षिण चीन सागर पर चीन 12 समुद्री मील इलाके पर अपना हक जताता है। इस इलाके को ‘12 नॉटिकल मील टेरिटोरियल लिमिट' कहते हैं। यह इलाका दक्षिण चीन सागर में बने आर्टिफीशियल आइलैंड के आसपास का ही है। चीन के अलावा दक्षिण-पूर्व एशिया के कई देश (ताइवान, फिलीपींस, वियतनाम और मलेशिया) भी इस इलाके पर अपना दावा करते हैं। पिछले महीने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ मीटिंग में चीनी प्रेसिडेंट शी जिनपिंग ने कहा था कि वे इस इलाके में सेना तैनात नहीं करना चाहते। हालांकि, अमेरिका को लगता है कि चीन यहां मिलिट्री एक्टिविटीज बढ़ा रहा है। इसलिए वह इस इलाके में आवाजाही कर रहा है।

असहिष्णुता के खिलाफ राष्ट्रपति से मिलने पैदल पहुंची कांग्रेस

देश में 'बढ़ती असहिष्णुता' के मसले पर कांग्रेस ने मंगलवार को संसद से राष्ट्रपति भवन तक पैदल मार्च निकाला। पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी की अगुवाई में यह मार्च संसद की गांधी प्रतिमा से शुरू हुआ। कड़ी सुरक्षा में निकाले गए मार्च में शामिल पूर्व पीएम मनमोहन सिंह और कई सीनियर कांग्रेसी नेताओं ने हाथों मोदी सरकार के खिलाफ नारे लिखे हुए तख्ती ले रखा था।

कांग्रेस ने पहले महात्मा गांधी को गोली मारे जाने वाली जगह से मार्च निकालने की इजाजत मांगी थी। दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा का हवाला देते हुए इसकी इजाजत नहीं दी थी।

कांग्रेस के 11 बड़े नेताओं का प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाकात कर एक ज्ञापन सौंपा। इन नेताओं में सोनिया, राहुल के अलावा लोकसभा में नेता विपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद भी शामिल थे। ज्ञापन में कहा गया है कि देश में असहिष्णुता का माहौल खत्म करने के लिए राष्ट्रपति अपने संवैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करें।

सोनिया गांधी ने सोमवार को भी राष्ट्रपति से मुलाकात की थी। सोनिया ने उन्हें बताया था कि कांग्रेस के नेता एक मार्च निकालकर उनसे इसलिए मिलना चाहते हैं। उन्होंने कहा था कि देश में सामाजिक और सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की मुहिम चलाई जा रही है।

कथित असहिष्णुता के मसले पर कांग्रेस बेहद आक्रामक रवैया अपनाने वाली है। संसद के शीतकालीन सत्र में भी पार्टी इस मामले पर मोदी सरकार को घेरेगी।

कांग्रेस नेताओं का मानना है कि इस मार्च से बिहार में 5 नवंबर को होने वाले आखिरी चरण के मतदान पर भी असर पड़ेगा। इसका महागठबंधन को फायदा हो सकता है। बिहार चुनाव के इस चरण में मुस्लिम बहुल इलाकों कटिहार, पूर्णियां, किशनगंज और अररिया यानी सीमांचल में मतदान होने वाला है।

कांग्रेस के पैदल मार्च पर भाजपा ने जमकर निशाना साधा है। उसके प्रवक्ता संबित पात्रा ने कहा कि एक तरफ भारत आगे बढ़ रहा है, लेकिन सोनिया गांधी कुंठा में मार्च कर रहीं हैं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस का विरोध मार्च कुंठा का मार्च है। कांग्रेस के लोग जब भी सत्ता से बाहर होते हैं तो कुंठित हो जाते हैं।

इसपर जवाब देते हुए कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने कहा कि यह विरोध नहीं, देश की आत्मा की पीड़ा है। लेकिन यह सरकार अंधी, बहरी और गूंगी है। मोदी सरकार को भूख, आंसू, पीड़ा समझ नहीं आती।

कांग्रेस का यह पैदल मार्च साहित्यकारों, कलाकारों, लेखकों और वैज्ञानिकों की ओर से अवार्ड वापसी के बाद हुआ है।

Monday, 2 November 2015

'अवार्ड वापसी' के खिलाफ 'किताब वापसी अभियान' हुआ तेज

लेखकों के 'अवार्ड वापसी' करने के विरोध में 'किताब वापसी अभियान' तेज हो गया है। अभियान की शुरुआत में ही इससे हजारों लोग जुड़ गए हैं। यह अभियान साहित्यकारों और लेखकों के अवार्ड वापसी करने के समकक्ष शुरु किया गया है। इससे पहले साहित्यकारों ने कलबुर्गी हत्याकांड के विरोध और दादरी घटना के बाद केंद्र सरकार को घेरने के लिए पुरस्कार लौटाना शुरू किया था।

इस अभियान में कहा जा रहा है कि जिन लेखकों ने सम्मान लौटाया है उनकी किताबें अगर लोगों के पास हैं तो उन्हें लौटा दिया जाए। इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि लेखक पुरस्कार लौटाकर राजनीति कर रहे हैं।

अभियान में उदय प्रकाश, अशोक वाजपेयी, कृष्णा सोबती, मंगलेश डबराल, जी एन देवी, नयनतारा सहगल, केकी दारुवाला, अनिल जोशी, वरियम सिंह संधु, सुरजीत पातर, जसविन्दर, गुरबचन भुल्लर, आतमजीत, बलदेव सिंह, दर्शन बत्तर, अजमेर सिंह औलख, मोहन भंडारी, प्रगट सिंह सतौज, नंद भारद्वाज, कुम वीरभद्रप्पा, रहमत तारिकी, गुलाम नबी ख्याल, मुनव्वर राना, सारा जोसेफ, होमेन बरगोहेन और कात्यानी विदमहे आदि के नाम शामिल हैं।

इस अभियान में कई लेखक, पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट जुड़ चुके हैं। इसमें से कुछ प्रमुख नाम हैं संजीव बेंगानी, सुरेश चिपलुणकर और अनिल पांडेय और आशीष कुमार अंशु। अभियान से जुड़े संजीव सिन्हा ने कहा कि सम्मान लौटानेवाले साहित्यकार राजनीति कर रहे हैं। वे देश का माहौल खराब कर रहे हैं और पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं।

सिन्हा ने कहा कि ये जन से कटे हुए लेखक हैं और जनादेश का असम्मान कर रहे हैं। इसलिए ऐसे साहित्यकार की किताब हम अपने पास नहीं रखना चाहते और उन्हें लौटा देना चाहते हैं।  मुहिम में लगे शिवानंद द्विवेदी सहर का कहना है कि जो साहित्यकार सम्मान वापस कर रहे हैं या वापसी का समर्थन कर रहे हैं उनकी किताबों को वापस करने को लेकर पाठक मन बना चुके हैं। किताब वापसी अभियान पाठकों का अभियान है।

अभियान के फेसबुक पेज पर जानकारी दी गई है कि साहित्य अकादमी पुरस्कार अब तक 1,110 लोगों को दिया गया है, जिसमें 536 लोग जीवित हैं। इनमें 26 साहित्यकारों ने अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाया है। बाल साहित्य की श्रेणी में 144 लेखकों को पुरस्कृत किया गया। जिनमें 128 लेखक जीवित हैं। इसमें सिर्फ एक लेखक ने अपना पुरस्कार लौटाया है। अनुवाद में 500 लेखकों को सम्मानित किया गया है। सभी अनुवादक जीवित हैं। तीन लेखकों ने पुरस्कार लौटाया है।

युवा पुरस्कार 111 लेखकों दिया गया है। उनमें सिर्फ एक लेखक ने पुरस्कार लौटाने की सूचना ई-मेल के माध्यम से अकादमी को दी है। पुरस्कार लौटाया नहीं है। वैसे अकादमी ने सम्मान लौटाने वाले लेखकों को एक पत्र लिखा है, जिसमें उनसे यह आग्रह किया गया है कि वे अपने सम्मान वापसी पर पुनर्विचार करें।

खूबसूरती बढ़ाने के लिए लिया स्टूडेंट लोन

जहां स्टूडेंट लोन लेकर पैसे ट्यूशन फीस, किराया या और खर्चे निबटाते हैं, वहीं एक लड़की ने कुछ अलग ही कर दिखाया है। कैथरीन नाम की इस लड़की ने स्टूडेंट लोन लेकर सारा पैसा अपने ब्रेस्ट को शेप देने और बोटोक्स ट्रीटमेंट पर खर्च कर दिया। दूसरा चौंकाने वाला खुलासा यह है कि जब इसने लोन लिया, उस वक्त वह स्टूडेंट भी नहीं थी।

मॉडलिंग का शौक

द सन में छपी खबर के अनुसार 29 साल की कैथरीन नाम की इस महिला को
मॉडलिंग का शौक था। उसे सुंदर दिखने के लिए पैसों की जरूरत थी। पैसों का इंतजाम करने के लिए उसने 14,000 पाउंड का स्टूडेंट लोन ले लिया। इस पैसे से उसने अपनी खूबसूरती निखारने के लिए ब्रेस्ट और बट का साइज बढ़वाया। कैथरीन बताती है कि वे केट प्राइज की तरह मशहूर मॉडल बनना चाहती हैं।

इसके साथ एक और चौंकाने वाली बात यह है कि उसने एक ही कॉलेज में दो बार एडमिशन लेकर स्टूडेंट लोन लिया।

कैथरीन ने 22 की उम्र में यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट लंदन में साइकोलॉजी कोर्स में दाखिला लिया था। उसने दाखिला पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि स्‍टूडेंट लोन के लिए लिया था। जैसे ही लोन का पैसा उसके अकाउंट में आया, उसने कॉलेज जाना छोड़ दिया। क्लास ना लेने की वजह से वह फेल हो गई। इसके बाद यूनिवर्सिटी ने उसे दोबारा पढ़ने का चांस दिया, तो उसने फिर से लोन ले लिया।

डिग्री से ज्यादा काम आई प्लास्टिक सर्जरी

कैथरीन का मानना है कि उनका करियर बनाने में डिग्री से ज्यादा उनकी प्लास्टिक सर्जरी काम आई। कैथरीन ने कहा,' मेरा करियर ब्रेस्ट जॉब की वजह से सेट हुआ। मुझे लगता है कि युनिवर्सिटी में जाकर पढ़ने वाले बच्चों को जॉब्स नहीं मिलती और वे आखिर में सुपरमार्केट में काम करने को मजबूर हो जाते हैं।

कैथरीन बताती है कि वह बचपन से ही अपने छोटे ब्रेस्ट को लेकर परेशान रहती थीं। कैथरीन को प्लास्टिक सर्जरी का आइडिया एक दोस्त ने दिया था। इसके बाद उन्होंने दो बार ब्रेस्ट इंलार्जमेंट के अलावा बोटोक्स और कोलाजिन के लिए इंजेक्शन लगवाए। 

कैथरीन का मानना है कि बड़े ब्रेस्ट से उनका कॉन्फिडेंस लेवल लाख गुना बढ़ गया है। कैथरीन बताती है कि सर्जरी के बाद उनके बी कप वाले ब्रेस्ट के लिए अब डी कप ब्रा की जरूरत होती है।
ब्रेस्ट जॉब के बाद उसके पास बचे पैसे को उसने अपने लिप्स को बड़ा कराने के लिए यूज किया। इस काम में उसने लोन के 560 पाउंड लगाए।

नहीं चुकाना पड़ेगा लोन

यूनिवर्सिटी इस शर्त पर लोन देती है कि उसे स्टूडेंट तब वापस करेगा, जब एक साल में 17,000 पाउंड कमाने लगेगा। कैथरीन को यह इसलिए नहीं चुकाना पड़ेगा, क्योंकि वे साल में इतना पैसा कभी कमा ही नहीं पाएंगी।

राम का जन्म उत्तर पश्चिम भारत या पाकिस्तान में हुआ थाः किताब का दावा

राम का जन्म आज के अयोध्या में नहीं हुआ था। बल्कि राम की जन्मभूमि उत्तर पश्चिम भारत या फिर पाकिस्तान

राम जन्मभूमि और बाबरी मस्जिद विवाद में AIMPLB भी एक पक्ष है। कुरैशी और फारुखी ने फैक्ट्स ऑफ अयोध्या एपिसोड (मिथ ऑफ राम जन्मभूमि) किताब लिखी है। इस किताब में दावा किया गया है कि वेदों या पुराणों में कहीं भी राम की जन्मभूमि गंगा के इलाके में नहीं बताया गया है। इनके अनुसार राम का जन्म सप्तसिंधु के इलाके में हुआ था। सप्तसिंधु हरियाणा और पंजाब, पाकिस्तान और अफगानिस्तान के पूर्वी इलाकों तक फैला हुआ है। इसलिए अयोध्या राम की जन्मभूमि है ही नहीं।

हिंदू युग की गणनाओं के हिसाब से राम का जन्म त्रेता युग में हुआ था। रामायण के फैक्ट के आधार पर इसका कैलकुलेशन किया गया है। इस आधार पर 5561 ईसा पूर्व या फिर 7323 ईसा पूर्व में हुआ होगा। इस काल में अयोध्या और उत्तर प्रदेश के दूसरे इलाकों में मनुष्य ही नहीं थे। इन इलाकों में 600 ईसा पूर्व से मनुष्यों की आबादी की जानकारी है। किताब में ऐसे ही कई अन्य तथ्य दिए गए हैं और इसके आधार पर राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद है ही नहीं।

कुरैशी ने कहा है कि दरअसल ये विवाद ब्रिटिश शासन की देन है जिसपर हम लड़ रहे हैं। ब्रिटिश सरकार ने राम मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने की झूठी अफवाह फैलाई थी। इसमें कोई सच्चाई नहीं है। इसे लेकर बोर्ड देशभर के हिंदू नेताओं से मिलेगा। बात-चीत से मामला सुलझ सकता है। इसके लिए लोगों को जागरुक करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि हम कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हैं। हमारा मकसद कोर्ट के फैसले को प्रभावित करने का नहीं है। हम केवल लोगों को सच बताना चाहते हैं। इस पर राजनीति नहीं होनी चाहिए।

किताब में मस्जिद निर्माण पर एक भी बात नहीं लिखी गई है। ये दावा है आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का। बोर्ड के असिस्टेंट जनरल सेक्रेटरी अब्दुल रहीम कुरैशी और कार्यकर्ता कमाल फारुखी ने एक किताब में इसका जिक्र किया है।

नेपाल के प्रधानमंत्री ने दी चेतावनी, 'हमारे घरेलू मामलों से दूर रहे भारत

भारत-नेपाल सीमा पर सोमवार को पैदा हुए ताजा तनाव के बीच नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने भारत को नेपाल के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देने की चेतावनी दी।

नेपाल के नए संविधान के खिलाफ मधेसी समुदाय के आंदोलन में सोमवार को एक भारतीय की मौत हो गई। उसकी मौत नेपाल में स्थित सीमावर्ती शहर बीरगंज में मधेसी प्रदर्शनकारियों और नेपाल पुलिस के बीच झड़प के कारण हुई थी। उसे नेपाल पुलिस की तरफ से गोली मारी गई थी। उसकी मौत के कुछ घंटे बाद प्रधानमंत्री ओली ने काठमांडू में एक कार्यक्रम में भारत की नेपाल नीति, खासकर नया संविधान लागू होने के बाद की नीति की आलोचना की।

किसी देश के खिलाफ नहीं है संविधान

नेपाल के प्रधानमंत्री ने आरोप लगाया कि भारत, मधेसी दलों को 1751 किलोमीटर लंबी भारत-नेपाल की खुली सीमा पर नाकेबंदी के लिए उकसा रहा है। उन्होंने कहा, 'आखिर भारत क्यों चार मधेसी दलों के ही पीछे खड़ा नजर आ रहा है? यह नेपाल सरकार की जिम्मेदारी है कि वह अपने देश के सभी समुदायों की बातों को सुने और उनकी शिकायतों को दूर करे।'

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि नए संविधान को संविधान सभा के 96 फीसदी सांसदों का समर्थन हासिल हुआ है और 'यह किसी देश के खिलाफ नहीं है।'

रोजमर्रा की चीजों का संकट सामने आया

बीरगंज में भारतीय की मौत के बाद मधेसी राजनीतिक दलों ने कहा कि वे काठमांडू में सरकार के साथ वार्ता नहीं करेंगे। इन दलों ने एक बयान में कहा है कि नए हालात में सरकार के साथ बातचीत का कोई नतीजा निकलने वाला नहीं है। सीमा पर मधेसियों की नाकेबंदी की वजह से नेपाल में रोजमर्रा की चीजों तक का भारी संकट पैदा हो गया है।

इस बीच नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी की नेता और मंत्री रेखा शर्मा ने मधेसी दलों से भारतीय की मौत के मामले में भावनाओं को भड़काने से बचने को कहा है. उन्होंने कहा कि इससे सिर्फ बातचीत के लिए सकारात्मक माहौल पर असर पड़ेगा। नेपाली कांग्रेस के सांसद रामहरि खातीवाड़ा ने कहा कि बीरगंज की घटना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी हालात पर नजदीकी निगाह बनाए हुए है। जिस तरह मधेसी समूह और सरकार मामले से निपट रहे हैं, उससे काफी दिक्कतें आने वाली हैं।

PM मोदी ने की थी निंदा

प्रधानमंत्री कार्यालय ने बताया ‘पीएम ने नेपाल में पुलिस की गोलीबारी में बिहार के एक युवक के मारे जाने पर हैरत जताई और घटना की निंदा की। साथ ही विस्तृत ब्यौरा देने का आग्रह किया।' पीएम मोदी ने नेपाली नेता को आश्वासन दिया कि भारतीय पक्ष की ओर से ईंधन और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति में कोई रूकावट नहीं होगी।

मुंबई पुलिस पर भरोसा नहीं था दिल्ली को सौंपा राजन

छोटा राजन से पूछताछ दिल्ली पुलिस के हवाले की गई है। मुंबई पुलिस के हाथ से लेकर मामला दिल्ली पुलिस को दिए जाने पर कई लोगों ने आपत्ति जताई थी। लेकिन सरकार ने दिल्ली पुलिस पर ज्यादा भरोसा दिखाया है।

इसकी एक वजह दिल्ली पुलिस का केंद्र के तहत होना भी है।

अधिकारियों ने बताया कि सरकार नहीं चाहती कि मुंबई पुलिस छोटा राजन से पूछताछ करे। राजन भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए दाऊद के खिलाफ एक प्रमुख कड़ी है। वह दाऊद के बारे में कई अहम जानकारियां दे सकता है। राजन को बुधवार को दिल्ली लाया जाएगा। इसके बाद पूछताछ का सिलसिला शुरू होगा।

यह पूछताछ 2011 में दिल्ली में एक बिजनेस मैन को फिरौती की कॉल को लेकर दर्ज हुई FIR पर आधारित होगी। 2 लोगों की टीम ने पूछताछ के लिए सभी कागजात इकट्ठे कर लिए हैं। इनमें राजन के खिलाफ 6 दूसरी FIR शामिल हैं।

दिल्ली पुलिस को मामला सौंपने पर अधिकारियों का कहना है कि भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की नजर में मुंबई पुलिस का रिकॉर्ड अच्छा नहीं है। इसलिए केस दिल्ली पुलिस को दिया गया है।

साथ ही दिल्ली पुलिस के पास छोटा राजन और उसके गुर्गों के खिलाफ 7 मामले दर्ज हैं। पूछताछ के लिए स्पेशल सेल बनाया गया है। इस टीम में डीसीपी प्रमोद कुशवाहा, इंस्पेक्टर राहुल शामिल हैं।