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Tuesday, 15 December 2015

1971 भारत-पाक युद्ध : जीत के असली हीरो थे सैम मानेकशाह

1971 की जंग वो जंग थी जिसमें भारतीय फौज ने पाकिस्तान को अपनी ताकत का नजारा दिखाया। यह जंग 16 दिसंबर को पाकिस्तान को धूल चटवाने के साथ खत्म हुई।  इस लड़ाई की वजह से ही बांग्लादेश आजादी में सांस ले सका। आज के इस दिन को हम लोग विजय दिवस के रूप में याद करते हैं। यह लड़ाई भारत से नहीं थी फिर भी भारत ने इसे लड़ा, जानिए क्या थी इसके पीछे वजह। यह लड़ाई विश्व में लड़ी गईं जंगों में सबसे छोटी लड़ाई में से एक है। इसके पीछे वजह यह है कि इसमें पाकिस्तान ने 13 ही दिनों में भारत के सामने घुटने टेक दिए थे।

भारत क्यों लड़ा


यह जंग पूर्वी पाकिस्तान (बांग्लादेश) को आजाद कराने के लिए मुक्तिवाहीनी सेना द्वारा लड़ी जा रही थी। भारत को इसमें इसलिए कूदना पड़ा क्योंकि पाकिस्तान, बांग्लादेश में रह रहे गैर मुस्लिम लोगों को निशाना बना रहा था।

क्या थी भारत की ताकत

इस जंग में भारत की तरफ से 5,00,000 सौनिकों की फौज ने हिस्सा लिया। पाकिस्तान की तरफ से टक्कर देने के लिए कुल 3,65,000 सैनिक थे। इस जंग में हक की लड़ाई लड़ने वाले मुक्तिवाहिनी के 1,75,000 सैनिक थे।

कितने सैनिक शहीद

इस भयंकर जंग में भारत और मुक्तिवाहिनी सेना के 3,843 सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए। वहीं पाकिस्तान ने इस युद्ध में अपने 9,000 सैनिक खोए।
इसके साथ ही अनुमान लगाया जाता है कि वहां पर 30 लाख के करीब मासूम लोग भी मारे गए। इसके साथ ही करीब 80 लाख लोग बांग्लादेश से भागकर भारत आ गए और यहीं शर्णार्थी बनकर रहने लगे।

जीत के असली हीरो-  सैम मानेकशाह

भारत ने जब मुक्तिवाहिनी की मदद करने का विचार किया तो आर्मी चीफ सैम मानेकशाह को उनके साथ भेजा गया। इंदिरा गांधी ने उनसे अप्रेल में युद्ध के बारे में बात की। इस वक्त सैम ने साफ कह दिया कि ले युद्ध के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। इसके पीछे उन्होंने वजह बताई कि भारत के 189 टैंकों में से कुल 13 टैंक जंग में ले जाने लायक हैं। इसके साथ ही उन्होंने मौसम के बारे में भी इंदिरा गांधी से बात की। सैम ने इंदिरा को बताया था कि मानसून आने की वजह से पूर्वी पाकिस्तान में बाढ़ का खतरा है जो युद्ध के लिए विपरीत परिस्थिति है।

इंदिरा ने सारी बातें ध्यान से सुनी। इसके बाद कमरे में मौजूद सब लोगों को बाहर भेज दिया और सैम को रोके रखा। इसके बाद सैम ने इस्तीफे की बात की तो इंदिरा ने उनका इस्तीफा स्वीकार नहीं किया। इसपर सैम ने कहा कि वे जंग में जीतने की गारंटी एक शर्त पर लेंगे। और शर्त यह थी कि उन्हें अपनी मर्जी से फैसले लेने दिए जाएंगे। इस बात को सुनकर इंदिरा ने उन्हें सारी पॉवर दे दी। इसके बाद दिसंबर में जो हुआ वो सबके सामने है। सैम की कुशल रणनीति की वजह से ही इस युद्ध में भारत ने पाकिस्तान के लगभग 90,000 सैनिकों को युद्ध के वक्त बंदी बना लिया था।

नहीं लिया जीत का श्रेय

पाकिस्तान के सरेंडर के वक्त प्रधानमंत्री ने उन्हें ठाका जाने के लिए कहा। इसपर सैम ने दरियादिली दिखाते हुए आर्मी कमांडर लेफटिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा को वहां भेजने की गुजारिश की।

Sunday, 15 November 2015

PMO से दरख्वास्त - खत्म की जाए IAS लॉबी

सीनियर गवर्नमेंट पोस्ट पर IAS के प्रभुत्व को खत्म करने के लिए बाकी ग्रुप ए सविर्सेज ने एक याचिका दायर की है। इसमें उन्होंने कहा है कि प्रधानमंत्री कार्यालय में साल 1995 के बाद से IAS लॉबी का दबदबा रहा है। इसके साथ उन्होंने कहा कि ज्वॉइंट सेक्रेट्री पदों पर सबसे ज्यादा भर्तियां IAS से होती हैं। 

IAS की भर्ती को अच्छे ग्रेड की वजह से हरी झंडी मिल जाती है, जिससे ग्रुप ए की बाकी सेवाओं के कर्मचारियों के साथ पक्षपात होता है। सरकारी पदों में IAS का दबदबा ज्वाइंट सेक्रेट्री पद से ही देखने को मिल जाता है। साल 1972 में सेक्रेट्री की 45 पोस्ट्स में 30 IAS अधिकारी से थे। जबकि 15 अन्य ग्रुप ए सर्विसेज से शामिल किए गए थे। वहीं, साल 1984 में 36 IAS और 25 अन्य ग्रुप ए सर्विसेज से थे।

बाकी ग्रुप ए सर्विसेज को आस

अन्य ग्रुप ए सर्विसेज उम्मीद है कि प्रधानमंत्री कार्यालय के स्पेशलाइजेशन को ज्यादा जोर देने पर यह दबदबा खत्म हो सकेगा। 36 अन्य ग्रुप ए सर्विसेज ने एक याचिका में 7वें वेतन आयोग को IAS के प्रभुत्व को खत्म करने और मेरिट को एक मौका देने के लिए कहा है।

कायम रही लॉबी


भारत सरकार के टॉप पोस्ट में IAS का प्रभुत्व आजादी के बाद घटा, लेकिन 1995 के बाद IAS लॉबी ने दोबारा अपने दबदबे को कायम करते हुए 92 सेक्रेट्री की पोट्स में 71 पोस्ट हासिल की।

ये था कारण

सरकारी विभागों में IAS के प्रभुत्व का कारण लिस्ट में नाम लिखने वालों और सेलेक्शन अथॉरिटीज का था। यहां तक कि डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल एंड ट्रेनिंग (DoPT) और कैबिनेट सेकेट्रिएट पर भी IAS अफसरों का प्रभुत्व का था।

IAS के दिन बहुरे

बीते दशकों में IAS अधिकारियों के लिए हालात अच्छे हुए हैं। केंद्र सरकार में अभी 91 सेक्रेट्री पोस्ट पर 73 IAS से हैं। 11 साइंटिस्ट हैं और बाकी के सात अन्य ग्रुप ए सेवाओं से हैं। इनमें IPS, IRS, IAAS या IRAS शामिल हैं।

JS से दबदबे की शुरुआत

IAS के प्रभुत्व की शुरुआत सीधे ज्वॉइंट सेकेट्री (JS) लेवल से होती है। ग्रुप ए सेवाओं की 7वें वेतन आयोग को सौंपी गई याचिका के मुताबिक वर्तमान में लगभग 75 फीसदी ज्वाइंट सेक्रेट्री, 85 फीसदी एडिशनल सेक्रेट्रीज और 90 फीसदी से ज्यादा सेक्रेट्रीज IAS से शामिल किए गए हैं।

इंजीनियर-डॉक्टर भी हिस्सा

साल दर साल नौकरशाही के हालात में तब्दीलियां हुई हैं। अब, ज्यादातर इंजीनियर, डॉक्टर और MBA ऑल इंडिया सर्विसेज (IAS, IPS और IFS) और अन्य ग्रुप ए सर्विसेज में शामिल हो रहे हैं। IAS  के लिए कोई अलग से परीक्षा नहीं होती है। जिनका भी ज्यादा ग्रेड होता है, उन्हें इस सेवा में शामिल किया जाता है।

PMO का टैलेंट पर जोर 

प्रधानमंत्री कार्यालय से मिली प्रतिक्रिया के आधार पर सूत्रों ने बताया कि पीएमओ सभी सेवाओं में बराबरी पर जोर देगा और सीनियर पोस्ट के लिए टैलेंट को प्राथमिकता देगा। पीएमओ ने DoPT को सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि ग्रुप ए सेवाओं के सभी अफसरों को समय रहते लिस्ट में शामिल किया जाए।

Tuesday, 10 November 2015

शायद बिहार में नीतीश और लालू यादव के ऐसे अच्छे दिन न आये होते !

दिल्ली में नरेन्द्र मोदी के कौशल की पहली परीक्षा अब है! उनके राजनीतिक जीवन की शायद अब तक की सबसे बड़ी चुनौती उनके सामने है! और शायद पहली भी! इस मामले में मोदी वाक़ई भाग्यशाली रहे हैं. मुझे नहीं याद पड़ता कि इससे पहले कभी उनके सामने कोई चुनौती आयी भी हो!

गुजरात दंगों को लेकर वह संकट में ज़रूर घिरे थे. लेकिन वह कोई राजनीतिक चुनौती नहीं थी, जिससे उन्हें निबटना हो. तब पार्टी के 'लौहपुरुष' ने रक्षा कवच बन कर उन्हें बचा लिया था! उसके बाद से तो कभी उनके सामने कोई मामूली-सा संकट भी नहीं आया. गुजरात में वह जब तक रहे, चक्रवर्ती सम्राट की तरह रहे. अजेय! शत्रु तो दूर, उनकी मर्ज़ी के बिना कहीं कोई पत्ता भी नहीं खड़क सकता था. तो फिर चुनौती भला कहाँ से आती? ऐसा कोई दरवाज़ा कहीं खुला छूटा ही नहीं था!

अहमदाबाद और दिल्ली का फ़र्क़!

लोकसभा चुनाव भी उन्होंने आराम-से जीत लिया. जनता काँग्रेस से पक चुकी थी. मोदी के पास विकास के बड़े-बड़े आलीशान, मनोहारी प्रोजेक्ट थे, सपनों के परीलोक थे, जादुई चिराग़ों की मोहिनी दमक थी. जनता ने उन्हें चुन लिया. अब वह सारे विपक्ष को बौना और मरघिल्ला कर चुके थे. दूर-दूर तक फिर कोई चुनौती नहीं दिख रही थी! सब कुछ कंट्रोल में था! पूरी दुनिया 'नसीबवाले' का लोहा मान रही थी!

लेकिन अहमदाबाद और दिल्ली में बड़ा फ़र्क़ है, यह दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल ने नौ महीने में ही बता दिया. उस हार को किसी ने चुनौती माना ही नहीं. लेकिन उसके नौ महीने बाद अब बिहार में मिली वैसी ही करारी हार को वही अनदेखा करेगा, जो या तो मूर्ख राजनीतिक हो या अहंकार में अन्धा! तब शायद नीतीश-लालू के 'अच्छे दिन' नहीं आये होते! मोदी अहंकारी तो हैं, लेकिन उनसे ऐसी मूर्खता की उम्मीद नहीं कि उन्हें राजनीति की ज़मीनी सच्चाइयाँ दिखना बन्द हो जायें! वैसे उन्हें शायद अब एहसास हो रहा हो कि दिल्ली में 'रामज़ादे बनाम हरामज़ादे' का नतीजा देख लेने के बाद अगर उन्होंने चाबुक कस दी होती तो शायद बिहार में नीतीश और लालू यादव के ऐसे अच्छे दिन न आये होते!

मोदी हैं तो बड़े समझदार! क़ायदे से तो उन्हें तभी पढ़ लेना चाहिए था कि देश की जनता को 'रामज़ादे' जैसे मुहावरे नहीं चाहिए. अब यह पता नहीं कि वह पढ़ नहीं पाये या पढ़ कर भी कुछ कर नहीं पाये! क्योंकि तब से लगातार वह मुहावरे जारी हैं और हर तरफ़ से बार-बार कोंचे जाने के बावजूद मोदी कभी टस से मस नहीं हुए! तो कुछ तो बात ज़रूर होगी!

मोदी क्या घृणा-भोंपुओं को बन्द करा पायेंगे?

तो अब बिहार की हार (Bihar Election 2015) के बाद मोदी की सबसे पहली चुनौती यही है कि क्या वह घृणा-भोंपुओं को बन्द करा पायेंगे? संघ और 'परिवार' क्या अपने एजेंडे को ठंडे बस्ते में डालेगा? मुश्किल लगता है! क्यों? आगे देखेंगे.

नरेन्द्र मोदी की दूसरी बड़ी चुनौती है उनकी अपनी ख़ुद की पैकेजिंग, ब्राँड मोदी, जिसने लोगों के मन में करिश्माई उम्मीदें पैदा कीं और इसीलिए लोगों को अब लगता है कि वे बुरी तरह ठगे गये हैं! मोदी अब कह रहे हैं कि विकास कोई फ़र्राटा दौड़ नहीं, बल्कि लम्बी मैराथन है. धीरे-धीरे होगा, समय लगेगा. लेकिन सच यह है कि मोदी जी ने उम्मीद तो 'फ़ार्मूला वन' जैसी रफ़्तार वाले विकास की जगायी थी. विकास का चक्का तो अभी जाम है. अब मोदी कैसे इसको गति दे पाते हैं और कैसे लोगों को समझा पाते हैं कि वे बेवक़ूफ़ नहीं बनाये गये हैं, यह वाक़ई एक कठिन और गम्भीर चुनौती है. इसे तो उन्हें तुरन्त हाथ में लेना होगा!

अहंकार और अड़ियल ज़िद्दीपन

लेकिन यह होगा कैसे? बिहार के बाद विपक्ष का हौसला तो बढ़ चुका है. उसे साथ लिये बिना बहुत-से क़ानून अटके पड़े रहेंगे. नरेन्द्र मोदी को अपना अहंकार छोड़ना होगा. राहुल गाँधी उन्हें पहले ही यह नसीहत दे चुके हैं!

बात सिर्फ़ अहंकार की ही नहीं, ज़िद्दीपन की भी है. मोदी को समझना चाहिए कि कई छोटी-छोटी बातें मिल कर बहुत बड़ी हो जाती हैं. वैसे ही, जैसे बूँद-बूँद से सागर भरता है. तीस्ता सीतलवाड और ग्रीनपीस से किस तरह और क्यों खुन्दक निकाली जा रही है, यह जनता समझती है और वह यह भी समझती है कि यह वह 'गवर्नेन्स' नहीं है, जिसकी शान में मोदी रोज़ क़सीदे पढ़ते हैं. लोगों को यह बात भी चुभती है जब न्यायपालिका को सरकारी घुट्टी पिलाये जाने की कोशिशें होती हैं. पहले तो कभी न्यायपालिका से ऐसी भाषा में संवाद नहीं किया गया! तो अगली चुनौती यह है कि क्या यह अड़ियल ज़िद की संस्कृति बदलेगी?

पार्टी में भी बढ़ सकती हैं चुनौतियाँ

राजनीतिक मोर्चे पर भी चुनौतियाँ कम नहीं हैं. अब तक अमित शाह के रूप में पार्टी पर नरेन्द्र मोदी की पूरी पकड़ थी. अमित शाह को धुरन्धर चुनाव-विजेता रणनीतिकार के तौर पर पेश किया गया था. शुरू के चुनाव उन्होंने जीते भी. लेकिन दिल्ली और बिहार के दो चुनाव लगातार बुरी तरह हारने के बाद उन पर सवाल उठेंगे ही. अगले साल बीजेपी के नये अध्यक्ष का चुनाव होना है. क्या अमित शाह को दूसरी बार यह कुर्सी मिलेगी या पार्टी को कोई नया अध्यक्ष मिलेगा, यह बड़ा सवाल है.

फिर अगले साल असम और पश्चिम बंगाल में चुनाव होने हैं. असम में तो काँग्रेस की लुँजपुँज हालत के कारण बीजेपी के लिए लड़ाई शायद उतनी कठिन न हो, लेकिन अब इसकी उम्मीद कम है कि पश्चिम बंगाल में बीजेपी कोई प्रभावी प्रदर्शन कर सकती है.

विकास का एजेंडा या संघ का एजेंडा?

दिक़्क़त यह है कि विकास की कोई रुपहली कहानी अभी है नहीं और शायद जल्दी हो भी न. विदेशी निवेशकों ने भी मोदी से जिस तेज़ी की उम्मीद लगायी थी, उसका कहीं अता-पता नहीं है. धार्मिक असहिष्णुता से लगातार कसैले हुए माहौल से बिदक कर कुछ निवेशक तो यहाँ से पैसा निकाल कर ही जा चुके हैं, जो आने को सोच रहे थे, वह फ़िलहाल हालात का जायज़ा ले रहे हैं. विपक्ष के असहयोग, ख़राब घरेलू हालात और दुनिया भर में डगमग अर्थव्यवस्था के कारण यहाँ विकास कैसे रफ़्तार पकड़े, यह बड़ा सवाल है.

उधर संघ के अपने लक्ष्य हैं. उसकी अपनी टाइमलाइन है. अस्सी के दशक में उसने राम जन्मभूमि आन्दोलन के ज़रिये हिन्दुत्ववाद को देश की राजनीति के केन्द्र में पहुँचाया था. संघ के हिसाब से अब समय इसे और आगे ले जाने का है. संघ की रणनीति इस बार अलग है. कोई बड़ा आन्दोलन कर पूरी ताक़त उसमें झोंकने और दुनिया का ध्यान उस ओर आकर्षित करने के बजाय संघ अब बहुत छोटे-छोटे मुद्दों से स्थानीय स्तरों पर हिन्दुत्व की चिनगारी धीरे-धीरे सुलगाये रखना चाहता है. पिछले अठारह महीनों में यही हुआ है. 'लव जिहाद' और घर-वापसी के बाद गोमांस का मुद्दा इसी रणनीति के तहत उछला है. सवाल यह है कि क्या संघ अब बिहार की हार से सबक़ लेकर अपने अभियान को रोक देगा? मुझे तो नहीं लगता!

Monday, 2 November 2015

'अवार्ड वापसी' के खिलाफ 'किताब वापसी अभियान' हुआ तेज

लेखकों के 'अवार्ड वापसी' करने के विरोध में 'किताब वापसी अभियान' तेज हो गया है। अभियान की शुरुआत में ही इससे हजारों लोग जुड़ गए हैं। यह अभियान साहित्यकारों और लेखकों के अवार्ड वापसी करने के समकक्ष शुरु किया गया है। इससे पहले साहित्यकारों ने कलबुर्गी हत्याकांड के विरोध और दादरी घटना के बाद केंद्र सरकार को घेरने के लिए पुरस्कार लौटाना शुरू किया था।

इस अभियान में कहा जा रहा है कि जिन लेखकों ने सम्मान लौटाया है उनकी किताबें अगर लोगों के पास हैं तो उन्हें लौटा दिया जाए। इसके पीछे तर्क दिया जा रहा है कि लेखक पुरस्कार लौटाकर राजनीति कर रहे हैं।

अभियान में उदय प्रकाश, अशोक वाजपेयी, कृष्णा सोबती, मंगलेश डबराल, जी एन देवी, नयनतारा सहगल, केकी दारुवाला, अनिल जोशी, वरियम सिंह संधु, सुरजीत पातर, जसविन्दर, गुरबचन भुल्लर, आतमजीत, बलदेव सिंह, दर्शन बत्तर, अजमेर सिंह औलख, मोहन भंडारी, प्रगट सिंह सतौज, नंद भारद्वाज, कुम वीरभद्रप्पा, रहमत तारिकी, गुलाम नबी ख्याल, मुनव्वर राना, सारा जोसेफ, होमेन बरगोहेन और कात्यानी विदमहे आदि के नाम शामिल हैं।

इस अभियान में कई लेखक, पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट जुड़ चुके हैं। इसमें से कुछ प्रमुख नाम हैं संजीव बेंगानी, सुरेश चिपलुणकर और अनिल पांडेय और आशीष कुमार अंशु। अभियान से जुड़े संजीव सिन्हा ने कहा कि सम्मान लौटानेवाले साहित्यकार राजनीति कर रहे हैं। वे देश का माहौल खराब कर रहे हैं और पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं।

सिन्हा ने कहा कि ये जन से कटे हुए लेखक हैं और जनादेश का असम्मान कर रहे हैं। इसलिए ऐसे साहित्यकार की किताब हम अपने पास नहीं रखना चाहते और उन्हें लौटा देना चाहते हैं।  मुहिम में लगे शिवानंद द्विवेदी सहर का कहना है कि जो साहित्यकार सम्मान वापस कर रहे हैं या वापसी का समर्थन कर रहे हैं उनकी किताबों को वापस करने को लेकर पाठक मन बना चुके हैं। किताब वापसी अभियान पाठकों का अभियान है।

अभियान के फेसबुक पेज पर जानकारी दी गई है कि साहित्य अकादमी पुरस्कार अब तक 1,110 लोगों को दिया गया है, जिसमें 536 लोग जीवित हैं। इनमें 26 साहित्यकारों ने अपना साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाया है। बाल साहित्य की श्रेणी में 144 लेखकों को पुरस्कृत किया गया। जिनमें 128 लेखक जीवित हैं। इसमें सिर्फ एक लेखक ने अपना पुरस्कार लौटाया है। अनुवाद में 500 लेखकों को सम्मानित किया गया है। सभी अनुवादक जीवित हैं। तीन लेखकों ने पुरस्कार लौटाया है।

युवा पुरस्कार 111 लेखकों दिया गया है। उनमें सिर्फ एक लेखक ने पुरस्कार लौटाने की सूचना ई-मेल के माध्यम से अकादमी को दी है। पुरस्कार लौटाया नहीं है। वैसे अकादमी ने सम्मान लौटाने वाले लेखकों को एक पत्र लिखा है, जिसमें उनसे यह आग्रह किया गया है कि वे अपने सम्मान वापसी पर पुनर्विचार करें।

नेपाल के प्रधानमंत्री ने दी चेतावनी, 'हमारे घरेलू मामलों से दूर रहे भारत

भारत-नेपाल सीमा पर सोमवार को पैदा हुए ताजा तनाव के बीच नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने भारत को नेपाल के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देने की चेतावनी दी।

नेपाल के नए संविधान के खिलाफ मधेसी समुदाय के आंदोलन में सोमवार को एक भारतीय की मौत हो गई। उसकी मौत नेपाल में स्थित सीमावर्ती शहर बीरगंज में मधेसी प्रदर्शनकारियों और नेपाल पुलिस के बीच झड़प के कारण हुई थी। उसे नेपाल पुलिस की तरफ से गोली मारी गई थी। उसकी मौत के कुछ घंटे बाद प्रधानमंत्री ओली ने काठमांडू में एक कार्यक्रम में भारत की नेपाल नीति, खासकर नया संविधान लागू होने के बाद की नीति की आलोचना की।

किसी देश के खिलाफ नहीं है संविधान

नेपाल के प्रधानमंत्री ने आरोप लगाया कि भारत, मधेसी दलों को 1751 किलोमीटर लंबी भारत-नेपाल की खुली सीमा पर नाकेबंदी के लिए उकसा रहा है। उन्होंने कहा, 'आखिर भारत क्यों चार मधेसी दलों के ही पीछे खड़ा नजर आ रहा है? यह नेपाल सरकार की जिम्मेदारी है कि वह अपने देश के सभी समुदायों की बातों को सुने और उनकी शिकायतों को दूर करे।'

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि नए संविधान को संविधान सभा के 96 फीसदी सांसदों का समर्थन हासिल हुआ है और 'यह किसी देश के खिलाफ नहीं है।'

रोजमर्रा की चीजों का संकट सामने आया

बीरगंज में भारतीय की मौत के बाद मधेसी राजनीतिक दलों ने कहा कि वे काठमांडू में सरकार के साथ वार्ता नहीं करेंगे। इन दलों ने एक बयान में कहा है कि नए हालात में सरकार के साथ बातचीत का कोई नतीजा निकलने वाला नहीं है। सीमा पर मधेसियों की नाकेबंदी की वजह से नेपाल में रोजमर्रा की चीजों तक का भारी संकट पैदा हो गया है।

इस बीच नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी की नेता और मंत्री रेखा शर्मा ने मधेसी दलों से भारतीय की मौत के मामले में भावनाओं को भड़काने से बचने को कहा है. उन्होंने कहा कि इससे सिर्फ बातचीत के लिए सकारात्मक माहौल पर असर पड़ेगा। नेपाली कांग्रेस के सांसद रामहरि खातीवाड़ा ने कहा कि बीरगंज की घटना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि उनकी पार्टी हालात पर नजदीकी निगाह बनाए हुए है। जिस तरह मधेसी समूह और सरकार मामले से निपट रहे हैं, उससे काफी दिक्कतें आने वाली हैं।

PM मोदी ने की थी निंदा

प्रधानमंत्री कार्यालय ने बताया ‘पीएम ने नेपाल में पुलिस की गोलीबारी में बिहार के एक युवक के मारे जाने पर हैरत जताई और घटना की निंदा की। साथ ही विस्तृत ब्यौरा देने का आग्रह किया।' पीएम मोदी ने नेपाली नेता को आश्वासन दिया कि भारतीय पक्ष की ओर से ईंधन और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति में कोई रूकावट नहीं होगी।

मुंबई पुलिस पर भरोसा नहीं था दिल्ली को सौंपा राजन

छोटा राजन से पूछताछ दिल्ली पुलिस के हवाले की गई है। मुंबई पुलिस के हाथ से लेकर मामला दिल्ली पुलिस को दिए जाने पर कई लोगों ने आपत्ति जताई थी। लेकिन सरकार ने दिल्ली पुलिस पर ज्यादा भरोसा दिखाया है।

इसकी एक वजह दिल्ली पुलिस का केंद्र के तहत होना भी है।

अधिकारियों ने बताया कि सरकार नहीं चाहती कि मुंबई पुलिस छोटा राजन से पूछताछ करे। राजन भारतीय सुरक्षा एजेंसियों के लिए दाऊद के खिलाफ एक प्रमुख कड़ी है। वह दाऊद के बारे में कई अहम जानकारियां दे सकता है। राजन को बुधवार को दिल्ली लाया जाएगा। इसके बाद पूछताछ का सिलसिला शुरू होगा।

यह पूछताछ 2011 में दिल्ली में एक बिजनेस मैन को फिरौती की कॉल को लेकर दर्ज हुई FIR पर आधारित होगी। 2 लोगों की टीम ने पूछताछ के लिए सभी कागजात इकट्ठे कर लिए हैं। इनमें राजन के खिलाफ 6 दूसरी FIR शामिल हैं।

दिल्ली पुलिस को मामला सौंपने पर अधिकारियों का कहना है कि भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की नजर में मुंबई पुलिस का रिकॉर्ड अच्छा नहीं है। इसलिए केस दिल्ली पुलिस को दिया गया है।

साथ ही दिल्ली पुलिस के पास छोटा राजन और उसके गुर्गों के खिलाफ 7 मामले दर्ज हैं। पूछताछ के लिए स्पेशल सेल बनाया गया है। इस टीम में डीसीपी प्रमोद कुशवाहा, इंस्पेक्टर राहुल शामिल हैं।